पेड़ और नदी की हुई जब गुफ्तगू,
न जाने कोनसी गहराईयो को छुआ होगा,
न जाने कोनसी उंचाईयो को छुआ होगा,
पेड़ ने खोला गिले-शिकवो का पन्ना,
ए नदी, तू हर पल बहती है,
झूमती है, गुनगुनाती है,
मीलों दूर तक जाती है,
मैं यहाँ स्थिर हूँ,
कभी मेरा भी झूमने का मनन करता है,
झूलने का मन करता है,
दुनिया की सैर करने का मन करता है,
नदी मुस्कुराने लगी और कहती है,
दोस्त, तेरा चलना फिरना होगा एक मात्र कट जाना,
न दे पायेगा तू छाया,
न आएगा कोई तेरे करीब फिर,
शुक्र मना, मुसाफिर को तू ठंडी छाया देता है,
फिर ये मुसाफिर भला कहाँ जाएगा,
मुसाफिर का नहीं, अपने नन्हे-मुन्ने पत्तों का सोच,
टूट के बिखर जाएंगे,
कुछ इन्हें दबोच देंगे तो कुछ तुझे जला देंगे,
ए पेड़, तू किस्मत वाला है जो स्थिर है,
चाहे जैसा भी है,
अपने परिवार के संग है,
तुझे झूला मैं झुलाऊगी,
अपने आप को मुझ में देख एक दफा,
मेरी लहरों के साथ छ्प-छपाने के साथ,
तू झूलेगा, झूमेगा और गुनगुनाएगा ॥
पेड़ अब मुस्कुराया, जब नदी ने उसे ये समझाया,
अब नदी की गहराईयो की बारी थी,
नदी ने खोला अब गिले-शिकवों का पन्ना,
मैं बहती-बहती थक गयी हूँ,
कभी बच्चों से जुदा हो जाती हूँ,
तो कभी माँ-बाप से पराई हो जाती हूँ,
स्थिरता चाहती हूँ मैं अब जीवन में,
पेड़ हैरान हुआ ये जान कर,
कोई झूमने से, या बहने से,
परेशान कैसे हो सकता है?
पेड़ अब बोला,
ए दोस्त, स्थिरता चाहती है तो तालाब में चली जा,
न झूमेंगी, न महकेगी,
सड़ने की गंध जब फैलाएगी,
मुसाफिर दूर भागेगा तुझसे,
न तेरे बच्चे खुश होंगे तुझसे,
बोल तू क्या ऐसा जीवन जीना चाहती है?
नदी सोच में खो गयी,
बहुत विचार करने के बाद अब बोली,
तो जब तेरा स्थिर रहना और मेरा बहना,
यही सही है, इसको कैसे ठीक समझें हम?
नदी छप-छपाने लगी,
झूमने लगी, गुनगुनाने लगी,
पेड़ वापिस नदी के संग झूलने लगा,
अब नतीजे पे पहुंचे दो दोस्त,
स्थिरता न तेरी है, न मेरी,
स्थिरता है इस इंसान की,
इस मुसाफिर के मनन की,
इसका मन स्थिर होता है,
नदी किनारे बैठ कर,
तुझसे गुफ्तगू लड़ा कर,
और पेड़ की छाया में बैठ कर,
यही है अपना जीवन,
मुसाफिर की स्थिरता में समर्पण ||
न जाने कोनसी गहराईयो को छुआ होगा,
न जाने कोनसी उंचाईयो को छुआ होगा,
पेड़ ने खोला गिले-शिकवो का पन्ना,
ए नदी, तू हर पल बहती है,
झूमती है, गुनगुनाती है,
मीलों दूर तक जाती है,
मैं यहाँ स्थिर हूँ,
कभी मेरा भी झूमने का मनन करता है,
झूलने का मन करता है,
दुनिया की सैर करने का मन करता है,
नदी मुस्कुराने लगी और कहती है,
दोस्त, तेरा चलना फिरना होगा एक मात्र कट जाना,
न दे पायेगा तू छाया,
न आएगा कोई तेरे करीब फिर,
शुक्र मना, मुसाफिर को तू ठंडी छाया देता है,
फिर ये मुसाफिर भला कहाँ जाएगा,
मुसाफिर का नहीं, अपने नन्हे-मुन्ने पत्तों का सोच,
टूट के बिखर जाएंगे,
कुछ इन्हें दबोच देंगे तो कुछ तुझे जला देंगे,
ए पेड़, तू किस्मत वाला है जो स्थिर है,
चाहे जैसा भी है,
अपने परिवार के संग है,
तुझे झूला मैं झुलाऊगी,
अपने आप को मुझ में देख एक दफा,
मेरी लहरों के साथ छ्प-छपाने के साथ,
तू झूलेगा, झूमेगा और गुनगुनाएगा ॥
पेड़ अब मुस्कुराया, जब नदी ने उसे ये समझाया,
अब नदी की गहराईयो की बारी थी,
नदी ने खोला अब गिले-शिकवों का पन्ना,
मैं बहती-बहती थक गयी हूँ,
कभी बच्चों से जुदा हो जाती हूँ,
तो कभी माँ-बाप से पराई हो जाती हूँ,
स्थिरता चाहती हूँ मैं अब जीवन में,
पेड़ हैरान हुआ ये जान कर,
कोई झूमने से, या बहने से,
परेशान कैसे हो सकता है?
पेड़ अब बोला,
ए दोस्त, स्थिरता चाहती है तो तालाब में चली जा,
न झूमेंगी, न महकेगी,
सड़ने की गंध जब फैलाएगी,
मुसाफिर दूर भागेगा तुझसे,
न तेरे बच्चे खुश होंगे तुझसे,
बोल तू क्या ऐसा जीवन जीना चाहती है?
नदी सोच में खो गयी,
बहुत विचार करने के बाद अब बोली,
तो जब तेरा स्थिर रहना और मेरा बहना,
यही सही है, इसको कैसे ठीक समझें हम?
नदी छप-छपाने लगी,
झूमने लगी, गुनगुनाने लगी,
पेड़ वापिस नदी के संग झूलने लगा,
अब नतीजे पे पहुंचे दो दोस्त,
स्थिरता न तेरी है, न मेरी,
स्थिरता है इस इंसान की,
इस मुसाफिर के मनन की,
इसका मन स्थिर होता है,
नदी किनारे बैठ कर,
तुझसे गुफ्तगू लड़ा कर,
और पेड़ की छाया में बैठ कर,
यही है अपना जीवन,
मुसाफिर की स्थिरता में समर्पण ||