Friday, 23 June 2017

"रहमत का एहसास"


भागती दौड़ती इस भीड़ में,
मैं भी कदम बढ़ा रही थी,
न सोचने की ज़रूरत थी,
कदम यूँ ही चलते चले जा रहे थे,
ख्यालों की चादर,
उधेड़ रही थी, या बन रही थी,
मन की लहरों के संग,
बस बहती चली जा रही थी,
क़दमों के ऊपर यूँ तो कोई बंधन न थे,
फिर भी लाल और हरी बत्ती का पालन कर रहे थे,

टिक-टिक की आवाज़ जब आये,
चलने लगे ये फिर से,

भागती दौड़ती इस भीड़ में,
अब दिखा एक बूढ़ा आदमी,
जो कदम बढ़ाने की कोशिश में था,
उसके कदम खुद से न जा रहे थे आगे,
क़दमों की गिनती का जाल,
सुलझाने में लगा था वो,
डगमगा रही थी गणना,
वैसे ही उसके  कदम,
कभी आगे चले,
कभी पीछे मुड़ जाए,

आवाज़ दी जब मैंने उसे,
थम गए उसके कदम,
आज वो गिनती करके थक गया था,
टिक-टिक की आवाज़,
सुनते-समझते वो थक गया था,

चलने लगे अब साथ हम,
गिनती क जंजाल,
सुलझ गए थे उसके,
मुस्कुराने लगा तब वो,
आँखें यूँ तो बंद थी उसकी,
खुली थी भीतर मगर,
कह गया वो कुछ ऐसा,
आँखें जो खुली हो कर भी बंद थी मेरी,
रौशनी दे गया वो मेरे भीतर,

कदम जो यूँ ही चलते चले जा रहे थे,
खयालो की चादर जो यूँ ही उधड़ या बुन रही थी,
रुक गए अब ये कदम,
रुक गए अब ये ख्याल,
खुदा की रहमत का हुआ अब एहसास,
सिर्फ आंसू और शुक्राना था अब फ़कीरा के पास ||

Tuesday, 6 September 2016

पेड़ और नदी की गुफ्तगू

पेड़ और नदी की हुई जब गुफ्तगू,
न जाने कोनसी गहराईयो को छुआ होगा,
न जाने कोनसी उंचाईयो को छुआ होगा,

पेड़ ने खोला गिले-शिकवो का पन्ना,
ए नदी, तू हर पल बहती है,
झूमती है, गुनगुनाती है,
मीलों दूर तक जाती है,
मैं यहाँ स्थिर हूँ,
कभी मेरा भी झूमने का मनन करता है,
झूलने का मन करता है,
दुनिया की सैर करने का मन करता है,

नदी मुस्कुराने लगी और कहती है,
दोस्त, तेरा चलना फिरना होगा एक मात्र कट जाना,
न दे पायेगा तू छाया,
न आएगा कोई तेरे करीब फिर,
शुक्र मना, मुसाफिर को तू ठंडी छाया देता है,
फिर ये मुसाफिर भला कहाँ जाएगा,
मुसाफिर का नहीं, अपने नन्हे-मुन्ने पत्तों का सोच,
टूट के बिखर जाएंगे,
कुछ इन्हें दबोच देंगे तो कुछ तुझे जला देंगे,
ए पेड़, तू किस्मत वाला है जो स्थिर है,
चाहे जैसा भी है,
अपने परिवार के संग है,
तुझे झूला मैं झुलाऊगी,
अपने आप को मुझ में देख एक दफा,
मेरी लहरों के साथ छ्प-छपाने के साथ,
तू झूलेगा, झूमेगा और गुनगुनाएगा ॥

पेड़ अब मुस्कुराया, जब नदी ने उसे ये समझाया,
अब नदी की गहराईयो की बारी थी,
नदी ने खोला अब गिले-शिकवों का पन्ना,
मैं बहती-बहती थक गयी हूँ,
कभी बच्चों से जुदा हो जाती हूँ,
तो कभी माँ-बाप से पराई हो जाती हूँ,
स्थिरता चाहती हूँ मैं अब जीवन में,
पेड़ हैरान हुआ ये जान कर,
कोई झूमने से, या बहने से,
परेशान कैसे हो सकता है?

पेड़ अब बोला,
ए दोस्त, स्थिरता चाहती है तो तालाब में चली जा,
न झूमेंगी, न महकेगी,
सड़ने की गंध जब फैलाएगी,
मुसाफिर दूर भागेगा तुझसे,
न तेरे बच्चे खुश होंगे तुझसे,
बोल तू क्या ऐसा जीवन जीना चाहती है?

नदी सोच में खो गयी,
बहुत विचार करने के बाद अब बोली,
तो जब तेरा स्थिर रहना और मेरा बहना,
यही सही है, इसको कैसे ठीक समझें हम?

नदी छप-छपाने लगी,
झूमने लगी, गुनगुनाने लगी,
पेड़ वापिस नदी के संग झूलने लगा,
अब नतीजे पे पहुंचे दो दोस्त,

स्थिरता न तेरी है, न मेरी,
स्थिरता है इस इंसान की,
इस मुसाफिर के मनन की,
इसका मन स्थिर होता है,
नदी किनारे बैठ कर,
तुझसे गुफ्तगू लड़ा कर,
और पेड़ की छाया में बैठ कर,
यही है अपना जीवन,
मुसाफिर की स्थिरता में समर्पण ||

Sunday, 7 August 2016

ਕਿੱਥੇ ਫੱਸ ਗਿਆ ਤੂੰ ਬੰਦਿਆ?

I wrote this poem in Punjabi originally but attempted my best to express the gist in English too. The words might not be apt, but the thoughts is what matter here. For Punjabi readers,

ਮੇਰੇ ਮੁਰਸ਼ਦ ਕਹਿੰਦੇ,
ਨਾ ਮਾਨ ਕਰ ਇਸ  ਤਨ ਦਾ,
ਨਾ ਮਾਨ ਕਰ ਇਸ ਧਨ ਦਾ,
ਛੱਡ ਦੇਣਾ ਇਹਨਾ ਨੇ ਵੀ ਸਾਥ,
ਤੇਰੇ ਆਖਰੀ  ਸਾਹ ਦੇ ਨਾਲ,
ਫੇਰ ਮਾਨ ਕਿਊਂ ਇਹਨਾ ਦਾ?
ਫੇਰ ਜੁੜਦਾ ਕਿਊਂ ਤੂੰ ਇਹਨਾਂ ਨਾਲ?
ਉਲਝ ਗਿਆ ਇਹ ਬੰਦਾ,
ਜਦ ਆਇਆ ਵਿਚ ਸੰਸਾਰ ਦੇ,
ਸੰਸਾਰ ਤਾਂ ਸਿੱਧੀ ਰਾਹ ਸੀ,
ਉਸ ਮਾਲਿਕ ਦੇ ਘਰ ਵੱਲ,
ਰਾਹਾਂ ਗ਼ਲਤ ਚੱਲਿਆ ਤੂੰ,
ਜੰਜਾਲ ਕਿਹਾ ਸੰਸਾਰ ਨੂੰ ਤੂੰ,
ਦੋਸ਼ ਦਿੱਤਾ ਉਸ ਰੱਬ ਨੂੰ,
ਓਹਨੇ ਤੈਨੂੰ ਇਕੱਲਾ ਛੱਡ ਦਿੱਤਾ,
ਭੁੱਲ ਬੈਠਾ ਤੂੰ ਬੰਦਿਆਂ,
ਤੂੰ ਰੱਬ ਨੂੰ ਅੱਜ ਇਕੱਲਾ ਛੱਡ ਦਿੱਤਾ,
ਰਾਹ ਤੱਕਦਾ ਹੋਏਗਾ ਉਹ  ਤੇਰੀ,
ਤੇਰੇ ਦੀਦਾਰ ਦੀ,
ਤੇਰੇ ਪਿਆਰ ਦੀ,
ਹੱਸਦੇ ਖੇਡਦਿਆਂ  ਤੂੰ ਸ਼ੁਕਰ ਨਾ ਕਿੱਤਾ,
ਮੁਸ਼ਕਿਲ ਵੇਲੇ ਤੂੰ ਮੁੜ-ਮੁੜ ਯਾਦ ਕਿੱਤਾ,
ਨਾਰਾਜ਼ ਹੋਇਆ ਤੂੰ ਉਸ ਕੋਲੋਂ,
ਕਿਹਾ ਤੂੰ ਮੈਨੂੰ ਕੱਲਾ ਕਿਊ  ਛਡਿਆ,
ਉਹ ਆੜੀ ਤੇਰਾ ਫੇਰ ਹੱਸਿਆ,
ਕੋਈ ਨਾ ਬੰਦਿਆਂ ਤੂੰ ਅੱਜ ਯਾਦ ਤਾਂ ਕਿੱਤਾ,
ਵੱਡੇ ਜਿਗਰ ਦਾ ਉਹ ਮਾਲਿਕ,
ਤੇਰੇ ਦੁਖੜੇ ਲੈ ਬੈਠਾ ਆਪਣੇ ਤੇ,
ਤੂੰ ਫੇਰ ਵੀ ਸ਼ੁਕਰ ਨਾ ਕਿੱਤਾ,
ਫੇਰ-ਫੇਰ  ਇਸ ਦੁੱਖ-ਸੁੱਖ ਦੇ ਜੰਜਾਲ ਵਿਚ,
ਤੂੰ ਆਪੇ ਆਪ ਨੂੰ ਘੁਮਾਉਂਦਾ ਰਿਹਾ,
ਰੱਬ ਨੇ ਤਾਂ ਦੁੱਖ-ਸੁੱਖ ਸੱਬ ਇੱਕ ਬਣਾਏ ਸੀ,
ਤੇਰਾ ਨਜ਼ਾਰਿਆਂ ਵੱਖ ਹੋ ਗਿਆ,
ਜੱਦ ਤੂੰ ਰੱਬ ਕੋਲੋਂ ਦੂਰ ਹੋ ਗਿਆ,
ਉਹ ਤਾਂ ਅੱਜ ਵੀ ਤੇਰੀ ਰਾਹ ਵੇਖਦਾ,
ਰੋਂਦਾ ਹੋਏਗਾ, ਤਰਸਦਾ ਹੋਏਗਾ,
ਤੇਰੇ ਦੀਦਾਰ ਨੂੰ, ਤੇਰੇ ਪਿਆਰ ਨੂੰ,
ਤੂੰ ਆਪਣਾ ਪਿਆਰ ਦੁਨਿਆਵੀ ਰਿਸ਼ਤਿਆਂ ਨੂੰ ਦੇ ਬੈਠਾ,
ਬੰਦਿਆਂ! ਇਹ ਤੂੰ ਕੀ ਕਰ ਬੈਠਾ?
ਪਰਤ ਜਾ ਆਪਣੀ ਗਲੀ,
ਉਹ ਰੱਬ ਦੇ ਘਰ ਦੀ ਗਲੀ,
ਸ਼ੁਕਰਾਨਾ ਕਰ ਉਸਦਾ ਤੂੰ ਬੰਦਿਆਂ,
ਸ਼ੁਕਰ ਕਰ ਆਪਣੇ ਮੁਰਸ਼ਦ ਦਾ ਬੰਦਿਆਂ,
ਆਖਿਆ ਮੰਨ ਲੈ ਉਸਦਾ,
ਫੱੜ ਲੈ ਬਾਂਹ ਉਸਦੀ,
ਯਾਦ ਕਰ  ਆਪਣੇ ਮਾਲਿਕ ਨੂੰ ਬੰਦਿਆ ||

For English readers,

"Dear Man, Where did you get stuck?"

My master says,
Don't be proud,
Neither of this body,
Nor of the money,
They will leave you,
With your last breath,
Why are you proud then?
Why do you connect yourself to them?
Man got lost,
When he came to this world,
The world was a direct way,
To the Lord's abode,
You walked on the wrong path,
You called this world a trap,
You blamed God,
For leaving you alone in this trap,
Dear Man, you left HIM alone,
Not HE left you alone,
You forgot him completely,
HE must be waiting for you,
For your love,
In your joyous moments,
you didn't remember HIM,
In your difficult phase of life,
you started remembering HIM too often,
You got pissed off with HIM,
For leaving you alone here,
Your true friend, The Almighty laughed at you,
He was happy that at least you remembered HIM,
HE is kind-hearted and loving,
HE took away all your problems,
You didn't even thank HIM for this,
You got stuck,
In this vicious circle of happy and sad moments,
For HIM each moment is the same,
It's just your perspective,
That got changed and started differentiating the two,
when you got too far away from HIM,
HE must be waiting for you,
Crying for you and your true love,
You gave all your love to worldly relationships,
Which won't last forever,
Man, what did you do?
Go back to the right path,
To the path of Lord's abode,
Thank HIM for everything,
Thank your Master for everything,
Listen and follow what HE says,
Just remember your Lord, always!

Wednesday, 11 May 2016

"सुन्दर गाँठ"


नाज़ुक मुलायम पाँव,
चले शहर और गाँव,
एक कदम के साथ हो छन,
दूजा कदम बना दे मधुर छन-छन,
एक सुर, एक ताल काफी न थी,
नयी ताल जोड़ने क लिए आई एक साथी,
जितनी मधुर आवाज़ हो,
उतने ही खूबसूरत दिखे वो,
हर कोने तक तेरी आवाज़ जाए, 
झांझर और बाँध ली जाए,
सुंदरता दिखी फकीरा को,
न जाने कई करोड़ों को, 
दर्द न समझी उन् बेड़ियों का वो, 
छन-छन की मद्धम और तेज़ आवाज़,
औरो के लिए मधुर वाणी,
कोई न समझा छुपी चीखतीं-चिल्लाती वाणी,
न जाने कितने जन्मों का बोझ,
गरीबी या फिर कोई बना ऐसा संजोग,
नाजुकता घुट-घुट कर रोई,
बेड़ियों के पीछे जा लकोई,
तोड़ दो मेरी झांझर,
कर रही ये मेरे पाँव बंजर, 
दिखावे की दुनिया से बाहर जियो, 
अंजान नहीं, सुध-बुध में जियो ॥ 

This poem is inspired by a picture (posted above) taken by Seema Ravandale. Her thoughts about this picture added a new perspective in me. Hope it does to you as well. Here are the comments by Seema,
"I encountered these beautiful feet of a young woman wearing anklets in a train accompanied by her 4-5 years old daughter. She must have married at very young age. I was wondering whether my beautification of her feet is romanticized because they also symbolize the burden of patriarchal society and/or a poverty she is carrying on her feet...
(Since old times women were made to wear such heavy anklets for two reasons - first to suppress the sexual desire and hence controlling her sexuality and second, in general poor people are obliged to make investment in jewellery as they do not have access to services like banks where their lil saving can be kept safe)"

Tuesday, 22 March 2016

"शिकायतों की करवटें"

लेहरों का साहिल से मिलना,
किसी का मन घबराया,
लहरों में देखा जब आक्रोश,
शांति पाठ सुनाया,
ॐ का उच्चारण किया,
प्यार-गुस्सा दोनों तरह समझाया,
क्यों इतना शोर?
जहाँ एक दिल दूजे का चोर,
साहिल - जहाँ दो दिल का हो मिलान,
कैसे करेगा कोई ये शोर सहन?
दो दिलों को तूने खूब डराया,
ऐ सागर, ये तूने क्या किया?

सागर मंद-मंद मुस्कुराया,
भला ऐसा मैंने क्या किया,
जो तू मुझसे खफा हुआ,
कितने बरस बाद आज मैं साहिल से मिला,
कितने इंतज़ार मैंने किया,
उसका तो तूने हिसाब भी न किया,
तुझे रेरा दिल दिखा,
हमसफ़र का  दिल दिखा,
प्यार तूने उससे किया,
गिला-शिकवा तूने सब मुझसे किया,
तनिक सोच क बता?
जब मैं अपनी मंज़िल से मिला,
तब तूने क्या किया?
उस कोमल दिल को किया तूने करीब,
जो था कुछ फासलों से दूर,
जहाँ तुम दो दिलों का मिलन कोमलता से हुआ,
या फिर किसी घबराहट वश हुआ,
वहीं मेरा मिलान हंगामें में हुआ,
जश्न हमने मनाया,
उस लम्हे में - जिसका हमने बरसों से इंतज़ार किया,
तू जानता नहीं, चलते-चलते थका-टूटा मैं,
कितनी मुश्किलों को पार किया,
उमीदें को मैंने खोया,
तेरे जैसों को याद कर दिल को समझाया,
इतने बरस बाद आज मैं घर आया,
ऐ मुसाफिर, बता मैंने क्या गलत किया?

लहरों का साहिल से मिलना,
अब किसी का दिल मुस्कुराया,
किसी की आँखों से प्यार बरसाया,
ऐ सागर, छोटा था मेरा दायरा,
तेरी बदौलत विशाल हुआ आज मेरा दायरा,
माफ़ करना फकीरा को ऐ दोस्त,
गिला-शिकवा मैंने किया बहुत,
तू सागर है - प्यार का सन्देश,
तेरी मंज़िल, तेरा साहिल - मिलन का है सन्देश || 

Tuesday, 3 November 2015

किरण ...


खोयी थी मैं किसी राहों में,
लिपटी थी किसी लम्हों में,
ना जाने किस इंतज़ार में थी?
क्यों इतनी ख़ामोशी थी?
आँखों में एक अजीब सी नमी थी,
चेहरे पे बस गमी थी,
वजह जानने की कोशिश की मैंने,
धुंधलाहट ही देखी मैंने,
ना जाने क्या गिले शिकवे थे,
उस भीड़ में मैं अकेली थी,
जैसे ही अकेलेपन का एहसास हुआ,
उसी पल आई इक किरण,
छप-छपाती खेलने लगी वो मेरे संग,
फिर भी ये गमी और नमी कुछ करने न दे रही थी,
ये किरण तो खुशियों की थी,
मुह मोड़ा नहीं उसने,
ले चली मुझे अपने संग,
धुंधलाहट में दिखा गयी वो चमक,
जॉन राहो में डूबी थी मैं,
ले चली मुझे उन राहो पे,
किरण ढल गयी,
लेकिन चमक और बढ़ गयी,
ख़ामोशी को एक आवाज़ दे गयी वो,
चेहरे से गमी ले गयी वो,
आँखों की नमी भी साथ ले गयी वो,
फकीरा  पर एक एहसान कर गयी वो किरण ...
फकीरा  पर एक एहसान कर गयी वो किरण …


Sunday, 18 January 2015

For my notorious friend ...

travel plans banaye hum,
ghum raha hai koi aur,
socha tha ye mera saathi hoga,
pata na tha inka saathi koi aur hoga,
apni mehbooba ko dil mein kaid kar,
chodd diya unhone hamara sang,
haar-shingaar ka sab saaman lekar,
chal di ye jodi Amsterdam ki aur,
manzil pahunch kar jab khabar mili,
adhoori si thi vo khabar,
na pata tha nav-vivahit jodi kab lautegi ghar ki aur,
mauka shayad ek hi tha inke paas,
toh mana kar aaye ye apna full honeymoon,
thaath-baath k saath swagat hua inka,
ye do-jism ek-jaan ban gaye the celebrity,
aate-jaate har koi puche inka haal chaal,
jalne lage the hum inse ab,
kar diya ab humne is jodi ko alag,
shatir nikle sahib fir se,
badla liya inhone fir humse,
fir se plan banaya inhone,
ab mehbooba k saath na sahi,
chal diye ye dude chakhna lekar,
mil baithege ye ab apne yaaro k sang,
Amsterdam mein jamege inke rang,
na jaane kya gul khilayege,
khabar nahi kab janaab ghar laut kar aayege? :(