खोयी थी मैं किसी राहों में,
लिपटी थी किसी लम्हों में,
ना जाने किस इंतज़ार में थी?
क्यों इतनी ख़ामोशी थी?
आँखों में एक अजीब सी नमी थी,
चेहरे पे बस गमी थी,
वजह जानने की कोशिश की मैंने,
धुंधलाहट ही देखी मैंने,
ना जाने क्या गिले शिकवे थे,
उस भीड़ में मैं अकेली थी,
जैसे ही अकेलेपन का एहसास हुआ,
उसी पल आई इक किरण,
छप-छपाती खेलने लगी वो मेरे संग,
फिर भी ये गमी और नमी कुछ करने न दे रही थी,
ये किरण तो खुशियों की थी,
मुह मोड़ा नहीं उसने,
ले चली मुझे अपने संग,
धुंधलाहट में दिखा गयी वो चमक,
जॉन राहो में डूबी थी मैं,
ले चली मुझे उन राहो पे,
किरण ढल गयी,
लेकिन चमक और बढ़ गयी,
ख़ामोशी को एक आवाज़ दे गयी वो,
चेहरे से गमी ले गयी वो,
आँखों की नमी भी साथ ले गयी वो,
फकीरा पर एक एहसान कर गयी वो किरण ...
फकीरा पर एक एहसान कर गयी वो किरण …

